फुरकान अंसारी।

हरिद्वार,28/06/2026। पिछले कुछ दिनों में उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में निहंग सिंहों से जुड़े घटनाक्रमों के बाद आम लोगों के बीच उनके इतिहास, परंपरा और जीवनशैली को लेकर जिज्ञासा तेजी से बढ़ी है। बीते करीब 15 दिनों के दौरान कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग और देहरादून में निहंग समुदाय से जुड़े तीन प्रमुख मामले सामने आने के बाद लोग यह जानना चाह रहे हैं कि आखिर निहंग सिंह कौन होते हैं और सिख इतिहास में उनकी क्या भूमिका रही है।

निहंग सिंह सिख धर्म के एक विशेष और वीर योद्धा संप्रदाय से जुड़े होते हैं, जिन्हें सिख पंथ के रक्षक और धर्मयोद्धा के रूप में जाना जाता है। सिखों के दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की रक्षा और अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष के उद्देश्य से निहंग परंपरा को संगठित स्वरूप प्रदान किया था। उनका उद्देश्य ऐसे योद्धाओं का निर्माण करना था जो धर्म, न्याय और मानवता की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहें।

‘निहंग’ शब्द का अर्थ होता है— ऐसा व्यक्ति जो सांसारिक सुख-दुख, दर्द और आराम से अप्रभावित रहकर अपने कर्तव्य और धर्म के प्रति पूरी तरह समर्पित हो। निहंग सिंह त्याग, तपस्या, सेवा और वीरता के प्रतीक माने जाते हैं।

इतिहासकारों के अनुसार, सिख साम्राज्य के शुरुआती संघर्षों के दौर में जब मुगल शासकों और विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा सिख समुदाय पर लगातार हमले किए जा रहे थे, तब निहंग योद्धाओं ने सिख धर्म और उसके अनुयायियों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विशेष रूप से अहमद शाह दुर्रानी के हमलों के दौरान निहंगों ने अद्भुत साहस और युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया था।

निहंग सिंहों की पहचान उनके विशिष्ट पहनावे और शस्त्रों से होती है। वे आमतौर पर गहरे नीले रंग का चोला पहनते हैं और सिर पर बड़ी एवं ऊंची पगड़ी, जिसे दुमाला कहा जाता है, धारण करते हैं। उनके साथ पारंपरिक शस्त्र जैसे तलवार, भाला, कृपाण, चक्र और अन्य हथियार होते हैं, जिन्हें वे केवल धार्मिक प्रतीक ही नहीं बल्कि आत्मरक्षा और धर्म रक्षा के साधन के रूप में भी देखते हैं।

निहंग परंपरा में घुड़सवारी और युद्धकला का विशेष महत्व है। वे पारंपरिक तौर पर छावनियों या डेरों में निवास करते हैं, जहां गुरुद्वारे स्थापित होते हैं और धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ युद्ध कौशल का अभ्यास भी किया जाता है। निहंग समुदाय आज भी अपनी प्राचीन परंपराओं, अनुशासन और जीवनशैली को संरक्षित किए हुए है।

उत्तराखंड में भी निहंग सिंह विभिन्न धार्मिक आयोजनों और मेलों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। बैसाखी पर्व, धार्मिक जुलूसों और अन्य आयोजनों के दौरान वे अपने पारंपरिक युद्ध कौशल, घुड़सवारी और शस्त्र संचालन का प्रदर्शन करते हैं, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र बनता है।

विशेष रूप से देहरादून में आयोजित होने वाला प्रसिद्ध झंडा साहिब मेला निहंग सिंहों के शौर्य और पारंपरिक करतबों को करीब से देखने का बड़ा मंच माना जाता है। यहां उनके द्वारा किए जाने वाले गतका प्रदर्शन, घुड़सवारी और युद्ध कौशल के हैरतअंगेज प्रदर्शन श्रद्धालुओं और पर्यटकों को रोमांचित कर देते हैं।

हाल के घटनाक्रमों के बाद उत्तराखंड में निहंग समुदाय को लेकर चर्चा और जिज्ञासा बढ़ी है, लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि निहंग सिंह सिख परंपरा के साहस, बलिदान और धर्म रक्षा की गौरवशाली विरासत के प्रतीक रहे हैं। (शूत्रो के हवाले से)

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