स्वामी रामदेव ने भारतीय पंचांग और विक्रम संवत को राष्ट्रीय जीवन में व्यापक रूप से अपनाने पर दिया जोर, आचार्य बालकृष्ण ने सम्मेलन को बताया ऐतिहासिक उपलब्धि,
26 राज्यों के 1,800 प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा, 35 पुस्तकों का विमोचन; 24 विद्वानों और शोधार्थियों को मिला सम्मान।
फुरकान अंसारी।
हरिद्वार, 31 अक्टूबर। पतंजलि विश्वविद्यालय में आयोजित 52वां अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन तीन दिनों तक चले व्यापक शैक्षणिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विमर्श के बाद ऐतिहासिक उपलब्धियों के साथ संपन्न हो गया। पतंजलि विश्वविद्यालय, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय एवं भारतीय विद्वत् परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस राष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत भाषा, योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन, सनातन संस्कृति, प्राच्य विद्याओं के संरक्षण तथा आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में इनके समावेश पर विस्तार से चर्चा हुई। सम्मेलन में भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के बीच समन्वय स्थापित करने पर भी जोर दिया गया।
समापन समारोह में प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री प्रदीप बत्रा, योगगुरु स्वामी रामदेव, आचार्य बालकृष्ण, देशभर से आए संत-महात्मा, धर्माचार्य, शिक्षाविद् एवं विद्वान उपस्थित रहे। तीन दिवसीय आयोजन में देश के 26 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों से लगभग 1,800 प्रतिभागियों ने सहभागिता की। सम्मेलन के दौरान 35 पुस्तकों का विमोचन किया गया, जबकि विभिन्न विषयों में उत्कृष्ट शोधपत्र प्रस्तुत करने वाले 24 विद्वानों एवं शोधार्थियों को सम्मानित किया गया।
भारतीय पंचांग और विक्रम संवत को राष्ट्रीय जीवन में मिले व्यापक स्थान : स्वामी रामदेव
योगगुरु स्वामी रामदेव ने भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और राष्ट्रीय पहचान को सुदृढ़ बनाने पर जोर देते हुए कहा कि भारतीय पंचांग एवं विक्रम संवत को राष्ट्रीय जीवन में अधिक व्यापक रूप से अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अहिंसा, सत्य, सद्भाव और मानव कल्याण पर आधारित जीवन दर्शन है।
स्वामी रामदेव ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की अवधारणाओं को केवल जातियों के दायरे में सीमित करके देखने के बजाय गुण, कर्म और चरित्र के व्यापक संदर्भ में समझने की बात कही। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में स्वस्थ विचार, नैतिक मूल्यों, व्यापक दृष्टिकोण और सांस्कृतिक चेतना का विकास करना भी होना चाहिए।
उन्होंने वर्तमान शिक्षा पद्धति की कमियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा एवं सनातन जीवन मूल्यों को शिक्षा व्यवस्था में उचित स्थान देने की आवश्यकता बताई।
सनातन परंपरा को लेकर पतंजलि में रचा गया इतिहास : आचार्य बालकृष्ण
आचार्य बालकृष्ण ने सम्मेलन को भारतीय ज्ञान परंपरा और सनातन संस्कृति के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि सम्मेलन के दौरान हुए विचार-विमर्श और संत-महात्माओं की सहभागिता से अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर सार्थक संवाद हुआ।
उन्होंने कहा कि विभिन्न मतों और पंथों से जुड़े संतों को एक मंच पर एकत्रित करना तथा सनातन शास्त्रों की शुद्धि के लिए सर्वसम्मति से समिति का गठन होना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। सम्मेलन में गठित ‘सनातन शास्त्र शुद्धि समिति’ को उन्होंने ऐतिहासिक पहल बताया।
आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि सम्मेलन में विद्वानों और संतों ने सुबह से देर रात तक बैठकर गंभीर विषयों पर विचार-विमर्श किया। भारतीय ज्ञान परंपरा, शास्त्रों और सनातन संस्कृति के संरक्षण के लिए सभी का एकजुट होकर कार्य करना भविष्य के लिए प्रेरणादायक है।
स्वामी रामदेव को विद्याधिपति-प्रशस्ति-पत्रम्, आचार्य बालकृष्ण को महामहोपाध्याय सम्मान
सम्मेलन के दौरान भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत, योगशास्त्र और आयुर्वेद के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाली विभूतियों को सम्मानित किया गया।
अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन के अध्यक्ष एवं केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने परम पूज्य स्वामी रामदेव को ‘विद्याधिपति-प्रशस्ति-पत्रम्’ भेंट कर सम्मानित किया। वहीं, संस्कृत, योगशास्त्र, आयुर्वेद एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और संवर्धन में उल्लेखनीय योगदान के लिए आचार्य बालकृष्ण को प्रतिष्ठित ‘महामहोपाध्याय’ उपाधि से विभूषित किया गया।
पतंजलि विश्वविद्यालय की प्रति-कुलपति साध्वी डॉ. देवप्रिया को ‘महाआचार्या’ सम्मान प्रदान किया गया। व्याकरण के क्षेत्र में विशिष्ट विद्वत्ता के लिए डॉ. शिवानी वी. को ‘व्याकरण पण्डिता’ सम्मान से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त डॉ. कविता होले सहित अन्य विद्वानों को भी उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
विभिन्न विषय-वर्गों में उत्कृष्ट शोधपत्र प्रस्तुत करने वाले 24 विद्वानों एवं शोधार्थियों को सर्वश्रेष्ठ शोधपत्र पुरस्कार प्रदान किए गए। संस्कृत विद्वान कविराज मनोहर लाल आर्य सहित विभिन्न विद्वानों और पदाधिकारियों का भी अभिनंदन किया गया।
सम्मेलन में प्रोफेसर अरुण रंजन मिश्रा को अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन का नया अध्यक्ष मनोनीत किया गया।
सनातन दर्शन में निहित है मानव कल्याण और प्रकृति संरक्षण का संदेश : एनपी सिंह
भारतीय शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष एनपी सिंह ने कहा कि सनातन दर्शन केवल आध्यात्मिक चिंतन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जीवन, समाज, प्रकृति और समग्र मानव कल्याण का व्यापक दृष्टिकोण समाहित है।
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के बीच समन्वय स्थापित करने को समय की आवश्यकता बताया। साथ ही भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय के आदर्शों और सनातन मूल्यों के व्यापक सामाजिक संदर्भ पर भी विचार रखे।
गुरुकुल शिक्षा को देशभर में अपनाने की आवश्यकता : स्वामी आनंद स्वरूप
समापन समारोह में पहुंचे शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप महाराज ने संस्कारयुक्त शिक्षा व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि गुरुकुल शिक्षा पद्धति को राष्ट्रव्यापी स्तर पर अपनाने की आवश्यकता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि 8 से 11 वर्ष तक की आयु के बच्चों को गुरुकुल आधारित शिक्षा उपलब्ध कराने की व्यवस्था लागू करने पर विचार किया जाना चाहिए। स्वामी आनंद स्वरूप ने पतंजलि विश्वविद्यालय और भारतीय शिक्षा बोर्ड के प्रयासों की सराहना करते हुए अपने दो विद्यालयों को भारतीय शिक्षा बोर्ड से संबद्ध कराने की घोषणा भी की।
पतंजलि में बच्चों को मिल रहे संस्कार स्वप्न साकार होने जैसे : प्रदीप बत्रा
प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री प्रदीप बत्रा ने कहा कि वे पिछले कई वर्षों से पतंजलि से जुड़े हुए हैं। यहां की कार्यशैली, विचारधारा और विकास कार्यों को देखकर उन्हें प्रसन्नता और गर्व का अनुभव होता है।
उन्होंने कहा कि पतंजलि में बच्चों को जिस प्रकार की शिक्षा और संस्कार दिए जा रहे हैं, वह किसी स्वप्न के साकार होने जैसा है। देश के अन्य संस्थानों को भी इस व्यवस्था से प्रेरणा लेनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि सनातन धर्म, वैदिक परंपराओं, भारत के गौरवशाली इतिहास और संस्कृति को अधिक सशक्त बनाने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाने चाहिए।
26 राज्यों के 1,800 प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा
सम्मेलन में देश के 26 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों से लगभग 1,800 प्रतिभागियों ने सहभागिता की। इनमें 552 शिक्षक एवं प्राध्यापक, 467 शोधार्थी, 403 विद्यार्थी तथा 378 अन्य प्रतिभागी शामिल रहे।
आयोजन में 32 कुलपतियों, 40 से अधिक संतों और 90 से अधिक विद्वानों सहित विभिन्न शैक्षणिक एवं आयोजन समितियों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति रही। तीन दिनों तक चले सम्मेलन में विद्वानों ने भारतीय शास्त्रों, संस्कृत साहित्य, दर्शन, योग, आयुर्वेद और पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
पांच नए शोध विषय-वर्ग जुड़े, तीन नई पुरस्कार श्रेणियां शुरू
सम्मेलन की शैक्षणिक उपलब्धियों में शोधपत्र प्रस्तुतिकरण के लिए पांच नए विषय-वर्गों को शामिल करना महत्वपूर्ण रहा। इनमें कुंभ रहस्यम्, भारतीय ज्ञान प्रणाली, भारतीय अनुसंधान पद्धति, बाल साहित्य तथा प्राच्यविद्या का पुनरावलोकन शामिल हैं।
इन विषयों को शामिल करने से भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों पर शोध और अकादमिक विमर्श का दायरा विस्तृत हुआ। इसके अतिरिक्त पतंजलि विश्वविद्यालय की ओर से प्रतिवर्ष तीन नई पुरस्कार श्रेणियां प्रायोजित करने की पहल की गई, जिनका शुभारंभ इसी सम्मेलन से हुआ।
35 पुस्तकों का विमोचन, 92 पुस्तक एवं प्रदर्शनी स्टॉल बने आकर्षण
सम्मेलन के दौरान भारतीय ज्ञान परंपरा, योग, आयुर्वेद, संस्कृत साहित्य, भारतीय दर्शन और प्राच्य विद्याओं से संबंधित 35 पुस्तकों का विमोचन किया गया।
विभिन्न विषय-वर्गों के अंतर्गत शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। इसके साथ ही 92 पुस्तक एवं प्रदर्शनी स्टॉल लगाए गए, जिनमें विभिन्न प्रकाशकों, संस्थानों और प्रायोजकों ने सहभागिता की। इन स्टॉलों के माध्यम से विद्यार्थियों, शोधार्थियों और विद्वानों को भारतीय शास्त्रों, संस्कृत साहित्य तथा नवीन शोध प्रकाशनों से परिचित होने का अवसर मिला।
कुलपति सम्मेलन में उच्च शिक्षा और भारतीय ज्ञान प्रणाली पर मंथन
सम्मेलन के अंतिम दिन कुलपति सम्मेलन का आयोजन किया गया। पूज्य स्वामी आर्षदेव एवं डॉ. गौतम आर.के. के समन्वय में हुई बैठक में विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और वरिष्ठ शिक्षाविदों ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को उच्च शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने पर विचार-विमर्श किया।
बैठक में संस्कृत एवं प्राच्य विद्याओं के अध्ययन-अध्यापन को प्रोत्साहित करने, विश्वविद्यालयों के बीच अकादमिक सहयोग बढ़ाने, भारतीय अनुसंधान पद्धति को विकसित करने तथा पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान को अधिक शोधोन्मुख बनाने जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
साध्वी देवप्रिया ने प्रस्तुत की तीन दिवसीय सम्मेलन की आख्या
पतंजलि विश्वविद्यालय की प्रति-कुलपति साध्वी डॉ. देवप्रिया ने सम्मेलन की विस्तृत आख्या प्रस्तुत करते हुए तीन दिनों के दौरान आयोजित शैक्षणिक, शोधपरक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का विवरण दिया।
उन्होंने देशभर से आए विद्वानों की सहभागिता, शोधपत्र प्रस्तुतिकरण, संत सम्मेलन में हुए विचार-विमर्श और आयोजन से प्राप्त उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह आयोजन केवल एक शैक्षणिक सम्मेलन नहीं, बल्कि संतों, विद्वानों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों को एक मंच पर लाकर भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल रहा।
उन्होंने आयोजन को सफल बनाने में आचार्य बालकृष्ण के मार्गदर्शन, प्रेरणा और सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।
100 से अधिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने मोहा मन
तीन दिवसीय सम्मेलन के दौरान पतंजलि विश्वविद्यालय की सांस्कृतिक टीम और विद्यार्थियों ने भारतीय संस्कृति, परंपरा एवं आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित 100 से अधिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और गतिविधियों के माध्यम से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
इन प्रस्तुतियों ने अतिथियों, संतों और विद्वानों का मन मोह लिया। आयोजन के अंत में स्वामी रामदेव ने सम्मेलन के मुख्य आयोजक ललित पोफलिया के सुपुत्र हर्षद पोफलिया, सह-आयोजक श्रीकांत बड़वे और राहुल राठी के योगदान के प्रति आभार व्यक्त किया।
साध्वी डॉ. देवप्रिया ने विश्वविद्यालय के शिक्षकों, विभागाध्यक्षों, संकाय सदस्यों, कार्यक्रम समन्वयकों, कर्मचारियों, आयोजन समितियों और विद्यार्थियों के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि अतिथि सत्कार, पंजीकरण, शैक्षणिक सत्रों, शोधपत्र प्रस्तुतिकरण, आवास, भोजन, मंच संचालन, तकनीकी व्यवस्थाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को सफल बनाने में सभी ने पूरी निष्ठा से कार्य किया।
सम्मेलन की सफलता को भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत, योग, आयुर्वेद और सनातन संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया। आयोजकों के अनुसार, देशभर से आए संतों, विद्वानों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों के बीच हुआ व्यापक विमर्श भविष्य में भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा एवं शोध की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयासों को नई दिशा प्रदान करेगा।


