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उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी देहरादून के चकराता का जौनसार बाबर क्षेत्र लगातार अपने अनोखे नियमों को लेकर सुर्खियां बटोर रहा है. यहां की संस्कृति और अनूठी परंपराओं के चलते यह क्षेत्र पहले ही अपना अहम स्थान रखता था लेकिन आज सामाजिक समानता के नियमों के लागू करने के बाद देशभर में इसके गांवों की सराहना की जा रही है.

unique traditions

महाभारत कालीन इस जगह पर रहने वाले लोग खुद को पांडवों का वंशज मानते हैं. चकराता ब्लॉक के जौनसार और बावर क्षेत्र के कुछ गांवों में पहले शादियों के दौरान महिलाओं को सोने के सिर्फ तीन गहने पहनने का नियम बनाया गया. अब शादियों पर होने वाले तरह-तरह के फास्टफूड और स्नेक्स पर भी पूरी तरह से रोक लगाया गया है. इसका मतलब है अगर आप जौनसार क्षेत्र की शादी में जाते हैं, तो आपको चाऊमीन, मोमो,टिक्की जैसे फास्ट फूड बिल्कुल भी नहीं मिलेंगे अगर कोई परिवार इन्हें परोसता भी है तो उन पर एक लाख का जुर्माना लगाया जाएगा. जौनसार के दाऊ, दोहा, छुटौ, बजौ, घिंगो और कैटरी गांव में इन नए नियमों को लागू किया जा रहा है इसके बाद यह क्षेत्र प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है.

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उत्तराखंड के चकराता क्षेत्र में स्थित जौनसार और बावर एक विशिष्ट जनजातीय क्षेत्र है, जो अपनी अनोखी सामाजिक व्यवस्था, मजबूत पारंपरिक न्याय प्रणाली और महाभारत काल से जुड़ी मान्यताओं के कारण अन्य समुदायों से अलग पहचान रखता है. यमुना और टॉन्स नदियों के बीच स्थित यह दुर्गम क्षेत्र, सदियों से अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है, जहाँ आधुनिकता के साथ-साथ प्राचीन परंपराएँ भी जीवंत हैं.

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जौनसार-बावर की सबसे चर्चित और अनूठी परम्परा हुआ करती थी भ्रात-बहुपति विवाह. इसमें एक महिला का विवाह घर के सबसे बड़े भाई से होता है और वह स्वतः ही उसके छोटे भाइयों की भी पत्नी बन जाती है. स्थानीय लोग इस परंपरा को महाभारत के पांडवों और द्रौपदी के विवाह से जोड़कर देखते हैं, जो इस क्षेत्र के पांडव वंश से होने के दावे की पुष्टि करता है. हालांकि वक्त के साथ इस परंपरा में बदलाव आया है, लेकिन कहीं दुर्गम इलाकों में इनके एक आध उदाहरण आज भी मिल जाते हैं.

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इस क्षेत्र की सामाजिक-न्यायिक प्रणाली की रीढ़ इसकी खुमड़ी-व्यवस्था जो पारंपरिक पंचायतें होती हैं. खुमड़ी एक प्राचीन और प्रभावशाली संस्था है जो समाज को एक सूत्र में बांधती है और विवादों का निपटारा करती है. इसका मतलब यह है कि परिवार या कोई भी मामला हो जाने पर यहीं पंचायतें न्याय करती हैं. जिस तरह आपने कुछ कहानियों में सरपंच के बारे में सुना होगा जो मुखिया हुआ करता था उसी तरह यहां खुमड़ी या गांव का मुखिया को स्याणा कहा जाता है. इसका पद वंशानुगत होता था लेकिन आज बैठकों के माध्यम से सबकी सहमति से ही इनका चुनाव होता है. यह व्यवस्था आधुनिक अदालतों की मौजूदगी के होते हुए भी बेहद मजबूत है लोगों को कोर्ट कचहरी के चक्कर नहीं काटने पड़ते है.

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इस क्षेत्र की विवाह से जुड़ी एक और विशेष प्रथा है जिसे जोजोरा विवाह कहते हैं. आमतौर पर जब शादी होती है तो बारात लेकर दूल्हे आते हैं, लेकिन इस परंपरा में बाराती दूल्हे के घर नहीं, बल्कि दुल्हन बारात लेकर दूल्हे के घर जाती है. यह रिवाज न सिर्फ लैंगिक भूमिकाओं को पलटता है, बल्कि दहेज के चलन को भी खत्म करता है. जोजोरा विवाह सादगी, समानता और फिजूलखर्ची से बचने का प्रतीक है. इसमें दुल्हन सिर्फ पाँच पारंपरिक वस्तुएँ (थाली, घड़ा, लोटा आदि) लेकर जाती है.

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हाल ही में, जौनसार-बावर के कई गाँवों ने सामाजिक सुधार की दिशा में एक साहसिक कदम उठाया है. उन्होंने शादियों और सामाजिक समारोहों में होने वाले फिजूलखर्ची, डीजे, फास्ट फूड और महंगे तोहफों पर सख्त प्रतिबंध लगा दिया है. इन नए नियमों का उद्देश्य सामाजिक दिखावे को खत्म करना, गरीब-अमीर के बीच के अंतर को खत्म करना है. इसके साथ ही स्थानीय पारंपरिक खान-पान (जैसे मंडुआ और झंगोरा) को बढ़ावा देना है.

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कुछ वक्त पहले ही यहां महिलाओं के आभूषणों को लेकर भी कठोर नियम बनाए गए हैं, जिसके तहत वे समारोहों में केवल तीन पारंपरिक गहने जिनमें फूली, झुमकी और मंगलसूत्र) ही पहन सकती हैं. ये नियम सामाजिक दबाव और आर्थिक बोझ को कम करने के लिए बनाए गए हैं, और इनका उल्लंघन करने पर ग्राम पंचायत द्वारा भारी जुर्माना लगाने का प्रावधान सुनिश्चित किया गया है.

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