अखिल भारतीय प्राच्य विद्या महासम्मेलन में शंकराचार्यों सहित विभिन्न गुरु-परंपराओं के संतों ने किया अभियान का समर्थन,
स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण द्वारा लिखित ‘वैदिक आख्यान विज्ञान’ ग्रंथ का हुआ विमोचन।
फुरकान अंसारी।
हरिद्वार, 30 अक्टूबर। सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति और प्राचीन शास्त्रों की प्रामाणिकता के संरक्षण को लेकर हरिद्वार स्थित पतंजलि विश्वविद्यालय में आयोजित अखिल भारतीय प्राच्य विद्या महासम्मेलन (AIOC) के दूसरे दिन देशभर के संतों, शंकराचार्यों, धर्माचार्यों और विद्वानों ने महत्वपूर्ण पहल की। सम्मेलन में विभिन्न गुरु-परंपराओं के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में ‘सनातन शास्त्र शुद्धि समिति’ के गठन के प्रस्ताव पर सर्वसम्मति बनी। इस पहल का उद्देश्य प्राचीन शास्त्रों के मूल स्वरूप का अध्ययन, उनकी प्रामाणिकता से जुड़े प्रश्नों का विद्वत्तापूर्ण परीक्षण और सनातन परंपराओं का संरक्षण करना है।
सम्मेलन में अखिल भारतीय संत समिति, विभिन्न अखाड़ों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), विश्व हिंदू परिषद सहित अनेक सनातनी संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। प्रस्तावित समिति के अंतर्गत विद्वत परिषद और संत-संन्यासी परिषद के गठन की व्यवस्था की गई है। साथ ही, सिख, जैन और बौद्ध परंपराओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की बात भी कही गई।
प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, विद्वत परिषद में आचार्यों, शास्त्रों के विशेषज्ञों और विभिन्न विषयों के विद्वानों को शामिल किया जाएगा। परिषद प्राचीन ग्रंथों में कथित प्रक्षेपण, पाठांतर और विकृतियों से जुड़े विषयों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट संत-संन्यासी परिषद को सौंपेगी। इसके बाद रिपोर्ट का परीक्षण समिति का मार्गदर्शक मंडल करेगा। आवश्यक विचार-विमर्श और संशोधनों के बाद ही किसी निष्कर्ष को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। इस प्रकार शास्त्रों से संबंधित विषयों पर विद्वानों के शोध और संतों के मार्गदर्शन के आधार पर निर्णय लेने की रूपरेखा प्रस्तुत की गई।
संत-संन्यासी परिषद के संयोजक का दायित्व आचार्य महासभा के पूज्य स्वामी परमात्मानंद जी महाराज को सौंपा गया, जबकि विद्वत परिषद के संयोजक के रूप में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीनिवास वरखेड़ी को जिम्मेदारी दी गई।
‘सनातन का गौरव लौटाना ही मेरा उद्देश्य’ : स्वामी रामदेव
समिति के गठन के दौरान योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज भावुक नजर आए। उन्होंने संतों से आग्रह किया कि इस पहल का श्रेय उन्हें नहीं चाहिए, बल्कि उनका उद्देश्य सनातन धर्म का गौरव पुनः स्थापित करना है। उन्होंने कहा कि यह किसी व्यक्ति विशेष का अभियान नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की प्रामाणिकता और भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास है।
इस अवसर पर योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज और आचार्य बालकृष्ण जी महाराज द्वारा लिखित सनातन धर्म के प्रसंगों पर आधारित वैज्ञानिक ग्रंथ ‘वैदिक आख्यान विज्ञान’ का विमोचन भी किया गया।
सनातन परंपरा के मूल स्वरूप को सामने लाने का आह्वान
सम्मेलन को संबोधित करते हुए स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा कि वेद, श्रुति, ऋषि परंपरा और सनातन धर्म के मूल स्वरूप को प्रामाणिक रूप में समाज के सामने लाना आवश्यक है। उन्होंने सनातन धर्म की वैज्ञानिकता को व्यापक स्तर पर प्रचारित करने और भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि आधुनिक डिजिटल युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से प्राप्त सूचनाओं और धार्मिक ग्रंथों से संबंधित संदर्भों की प्रामाणिकता की जांच करना जरूरी है। उनके अनुसार, विभिन्न डिजिटल माध्यमों पर देवी-देवताओं और धार्मिक परंपराओं को लेकर प्रस्तुत किए जाने वाले दावों का मूल्यांकन मूल ग्रंथों और प्रमाणिक संदर्भों के आधार पर किया जाना चाहिए।
स्वामी रामदेव ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक और वैचारिक पहचान उसकी सनातन परंपरा से जुड़ी है। उन्होंने सामाजिक एकता, राष्ट्रीय विकास, चरित्र निर्माण, आर्थिक प्रगति और भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन को देश की उन्नति के लिए महत्वपूर्ण बताया।
आचार्य बालकृष्ण बोले—योजनाबद्ध तरीके से होगा कार्य
पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि संतों द्वारा सनातन शास्त्र शुद्धि अभियान के लिए उठाया गया कदम महत्वपूर्ण है। इस कार्य को प्रमाणिकता, गंभीरता और योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा।
उन्होंने बताया कि भारतीय इतिहास और परंपराओं से जुड़े विषयों पर शोध तथा ऐतिहासिक तथ्यों के पुनर्मूल्यांकन का कार्य भी पतंजलि योगपीठ में किया जा रहा है। उन्होंने अभियान को सफल बनाने के लिए संतों, विद्वानों और शोधकर्ताओं के सामूहिक योगदान पर जोर दिया।
संतों ने विद्वत्ता, आचरण और प्रमाणिक अध्ययन पर दिया जोर
कार्ष्णि पीठाधीश्वर स्वामी गुरु शरणानंद जी महाराज ने सुझाव दिया कि समिति में ऐसे विद्वानों को शामिल किया जाए, जिनका आचरण शुद्ध हो और जिन्हें शास्त्रों का गहन ज्ञान हो। उन्होंने गुरु-कृपा, साधना और आध्यात्मिक अनुशासन को ज्ञान प्राप्ति का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं और मानवता की सेवा ही उपासना का व्यापक स्वरूप है।
मलूक पीठाधीश्वर श्री राजेंद्र दास जी महाराज ने सनातन धर्म और उसके ग्रंथों के संबंध में उठाए जाने वाले प्रश्नों का उत्तर अध्ययन, प्रमाण और सामूहिक विद्वत विमर्श के माध्यम से देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने वेदों को सनातन परंपरा का प्रमुख प्रमाण बताते हुए शास्त्र शुद्धि अभियान को वर्तमान समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता बताया।
जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज ने ऑनलाइन उद्बोधन में कहा कि धार्मिक ग्रंथों में समय के साथ जोड़ी गई कथित भ्रांतियों और विकृतियों का गंभीर अध्ययन होना चाहिए। उन्होंने सनातन परंपरा के संरक्षण के लिए देश के शीर्ष संतों और विद्वानों के एकजुट होकर कार्य करने पर जोर दिया।
स्वामी गोविंददेव गिरि जी महाराज ने स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि धर्मशास्त्रों का समय-समय पर धर्मानुकूल और वेदानुकूल चिंतन आवश्यक है। उन्होंने शास्त्रों में कथित प्रक्षेपों के अध्ययन और उनके परीक्षण के कार्य को सामूहिक प्रयास से आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
ज्योतिष पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती जी महाराज ने भी समिति के गठन का समर्थन किया। उन्होंने सनातन परंपरा के संरक्षण और शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय ज्ञान परंपरा के विस्तार की आवश्यकता बताई।
विभिन्न धार्मिक संगठनों ने दिया समर्थन
आचार्य महासभा के स्वामी परमात्मानंद जी महाराज ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए सामूहिक प्रयासों को आवश्यक बताया। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि सनातन धर्म समानता और सभी के सम्मान का संदेश देता है। उन्होंने सामाजिक भेदभाव से दूर रहने की आवश्यकता पर बल दिया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल जी ने सनातन धर्म की चुनौतियों पर गंभीर चिंतन करने और भारतीय राष्ट्र को मजबूत बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा में विविधताओं के सम्मान और सबको स्वीकार करने की भावना निहित है।
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने वेद, गीता और सनातन सिद्धांतों के माध्यम से मानवीय समस्याओं के समाधान की बात कही। अखिल भारतीय संत समिति के महासचिव स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने शास्त्रों में कथित प्रक्षेपों के अध्ययन का समर्थन किया।
परमार्थ निकेतन आश्रम के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती जी महाराज ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के साथ ऋषियों की ज्ञान परंपरा और विवेक पर आधारित ‘ऋषि इंटेलिजेंस’ (RI) की अवधारणा पर बल दिया। हरि सेवा आश्रम के महामंडलेश्वर स्वामी हरि चेतनानंद जी महाराज ने भी इस अभियान में पूर्ण सहयोग देने की बात कही।
देशभर के संतों, शंकराचार्यों और विद्वानों की भागीदारी
सम्मेलन में देशभर के विभिन्न मठों, अखाड़ों, धार्मिक संस्थाओं और गुरु-परंपराओं से जुड़े संतों ने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया या अपने संदेश भेजकर अभियान को समर्थन दिया।
उपस्थित प्रमुख संतों में श्री पंचायती अखाड़ा निर्मल के प्रमुख श्री ज्ञानदेव सिंह जी महाराज, स्वामीनारायण संस्थान (BAPS) के स्वामी भद्रेशदास जी महाराज, विश्व जागृति मिशन के संस्थापक अध्यक्ष सुधांशु जी महाराज, आचार्य पुण्डरीक गोस्वामी जी, वाराणसी के सतुआ बाबा संतोष दास जी महाराज, पेजावर मठ के स्वामी विश्वप्रसन्न तीर्थ जी, इस्कॉन के गौरांग दास प्रभु, रामकृष्ण मठ के स्वामी आत्मप्रियानंद जी, आर्य समाज के स्वामी आर्यवेश जी और राष्ट्र सेविका समिति की बहन शांताकुमारी सहित अनेक धर्माचार्य शामिल रहे।
इसके अतिरिक्त कांची कामकोटि मठ, श्रृंगेरी शारदा पीठ, द्वारका पीठ, उत्तरादि मठ, व्यासराज मठ, पालीमारु मठ और अन्य प्रमुख धार्मिक संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भी सम्मेलन में सहभागिता की। कई संतों ने वीडियो संदेश और दूरभाष के माध्यम से अपने विचार रखे तथा अभियान के प्रति समर्थन व्यक्त किया।
कार्यक्रम में आचार्य वीरनारायण पांडुरंगी, भारतीय विद्वत परिषद के प्रतिनिधियों, एआईओसी के पदाधिकारियों, 23 विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, पतंजलि विश्वविद्यालय की प्रति-कुलपति साध्वी डॉ. देवप्रिया जी, पतंजलि परिवार के वरिष्ठ सदस्यों, विभागाध्यक्षों, संन्यासियों और विद्यार्थियों की उपस्थिति रही।
लगभग 40 विद्वानों ने किया शास्त्र विमर्श
सम्मेलन के अंतर्गत आयोजित सनातन शास्त्र विमर्श में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से जुड़े लगभग 40 विद्वानों ने भाग लिया। इनमें काशी हिंदू विश्वविद्यालय, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय तिरुपति, हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, उत्तराखंड संस्कृत अकादमी तथा अन्य प्रमुख संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल रहे।
विद्वानों ने सनातन शास्त्रों, भारतीय ज्ञान परंपरा, प्राचीन ग्रंथों की प्रामाणिकता और उनसे जुड़े शोध विषयों पर विचार-विमर्श किया। सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि शास्त्रों से संबंधित निष्कर्ष गहन अध्ययन, मूल स्रोतों के परीक्षण और विशेषज्ञों के विमर्श के आधार पर सामने आने चाहिए।
कुल मिलाकर, पतंजलि में आयोजित इस महासम्मेलन में सनातन शास्त्रों के संरक्षण, प्राचीन ग्रंथों की प्रामाणिकता के अध्ययन और भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यापक स्तर पर प्रतिष्ठित करने के लिए सामूहिक प्रयासों की रूपरेखा सामने आई। अब प्रस्तावित समिति और उससे जुड़ी परिषदों के माध्यम से इस दिशा में अध्ययन, शोध और विमर्श को आगे बढ़ाने पर जोर रहेगा।


